रविवार, ५ मे, २०२४

चित्र काव्य सकाळ

*आले  रवी राजे नभी
उजळल्या दाही दिशा
सोनसळी किरणांत 
न्हाली मंगलमय ऊषा      

 जणु करीती वंदन
दोन तरु आदराने 
यावे रवी राजे नभी
सृष्टी फुलली मोदाने   


प्रतिबिंब आदित्याचे
अवर्णनीय   खरोखर 
शांत निश्चल जलात
दिसे किती मनोहर

थंड मंद पवनाची 
झोंबे अंगा झुळुक
करी मनाला प्रसन्न 
 नव कामास उत्सुक
असतेच सकाळ ती
नव आशा  फुलवते 
दूर  करुनी निराशा 
नव चैतन्य जाणवते

वैशाली वर्तक 
अहमदाबाद

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